सोमवार, 16 अक्तूबर 2017

सवाल आरुषि की माँ से

 जैसे है हक़ तुम्हें जीने का 
वैसे ही हक़ था उस नन्हीं जान को भी दुनिया में रहने का 
हाँ तुम्हारी आँखों में नहीं है तड़प 
ये जान लेने की कि किसने काटा गला तुम्हारी बेटी आरुषि का  
अब लिख रही हो कविता 
तुम्हारी कविता भी वो सवाल नहीं उठाती 
मन फरेबी है , कब मछली सा पलट के समन्दर का पानी पी लेता है 

मदद करनी थी तफ्तीश में 
मिटा डाले क्यूँ सारे साक्ष्य ?
कानून की आँख पर तो पट्टी बँधी है 
ज़मीर भी क्यों सोने चला गया है 
न दिन चढ़ता है ,न तारीख बदलती है,ठहर जाता है वक़्त 
ये ऐसा वाक़या हजार सवाल करता है 
तुम्हारी आँखों में वो सवाल क्यूँ नहीं उठता ?
जलजला आना चाहिये था 
क्या राज दफ़न है तुम्हारे सीने में 
तुम्हारी ममता कभी तो सवाल पूछेगी 
चीख-चीख कर आसमान सर पे उठा लेगी 
हाँ बताओ वो बात भी दुनिया को 
जो सबक हो कि फिर आगे कोई उस राह न चले 
न चढ़े बलि इस तरह कोई भी ज़िन्दगी 
न मुरझाये कोई कली इस तरह असमय , अकारण ,अकस्मात


बुधवार, 6 सितंबर 2017

कैसे कोई उड़ान भरे

सूने हो गये घर-अँगना , जो आबाद हुये थे बच्चों के आने से ,
मन की ये फितरत है , सजा लेता है दुनिया जिन क़दमों की आहट से भी ,
बुन लेता है रँगी सपने उन लम्हों के अफसानों से भी.......

अब के बरस 
कुछ अपने हैं हम से बिछड़े ,
कुछ सपने परवान चढ़े 

जीवन की ये रीत पुरानी 
जैसे कोई बहता पानी 
इश्क किनारे से कर ले तो,
कैसे कोई उड़ान भरे 

क्या खोया क्या पाया हमने 
एक  महीन कागज हिसाब का 
छोड़ो छोड़ो ,क्या पायेंगे ,
काँटों से दामन कौन भरे 

ढूँढ रहा है बहाने इन्सां 
अपना ही दम भूल गया 
अपने क़दमों चलना ही ,
पँखों की पहचान लगे

 
 

रविवार, 28 मई 2017

और ज़माना धूप ही धूप

दुनिया की सारी माँओं के लिये 

माँ  ये क्या बात है कि 
सुख में तुम मुझे याद आओ या न आओ 
दुख में तुम हमेशा मेरे सिरहाने खड़ी होती हो 
जब मैं नन्हीं बच्ची थी 
मैंने पहचाना पहला स्पर्श तुम्हारा ही 
मेरे आने से पहले ही तुमने ,
सजा लिया था मुझसे अपना सँसार 
फूलों सा तुमने पाला मुझको 
बिन माली गुलशन का रूप है क्या 
ज़िन्दगी ने लिये कितने ही इम्तिहाँ 
हर ठोकर पर निकला मुहँ से ' हाय माँ '
माँ तुम ठण्डी छाया हो 
और ज़माना धूप ही धूप 
ये जीवन है माँ की बदौलत 
माँ की महिमा ऐसी अनूप 

सोमवार, 10 अप्रैल 2017

श्रद्धाँजलि

राकेश गुप्ता जी के निधन पर श्रद्धाँजलि  

आज रोया है आसमाँ भी 
हाय खो दिया है हमने एक नम सीना 
तुमने जिया था ज़िन्दगी को एक शायर की तरह 
दर्द की इन्तिहाँ को जानता है एक शायर ही 

तुम चलते हुए कभी थके ही न थे 
वक़्त ने जकड़ा तो जंजीरों की तरह 
मौत की आदत है, ये बहाना माँगे 
तुमने पी लिये थे घूँट इसके , जीते-जी ही 
पिया इतना दर्द और किसी से बाँटा भी नहीं 

तुम्हारी साथी कलाइयों ने ,घबराहट में छू ली होंगी कितनी ही गर्म पतीलियाँ 
हाथ से छूटे होंगे सालन भी कई 
सारी जद्दो-जहद किसी काम न आई 
तुम आज़ाद हुए देह के पिंजरे से 
तुम्हारे बिना रीती दुनिया ,झाँक रही है किसी की आँखों से 
फेरों की वेदी से लेकर चिता की अग्नि की लपटों तक का सफर ,
घूम गया होगा किसी की आँखों के आगे से 

अब अतीत की यादें हैं , डूबें के किनारों पर ले आयें 
तुम सो जाओ कि तुम्हें ज़न्नत नसीब हो 
तुमने कभी किसी को दुख न दिया ,
तुम्हें सुख नसीब हो 

गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

कुछ यादगार लम्हे ,

थोड़े लम्हे चुरा लें 
थोड़ी बात बना लें 
जीवन की आपा-धापी से 
फुर्सत का कोई सामान जुटा लें 

पेड़ों के झुरमुट से झाँकता हुआ ,
तारों भरा आसमाँ 
मद्धिम सी रौशनी में ,समुद्र  किनारे चंचल सी लहरों की अठखेलियाँ 
तुम ही तो लाये हो ये मुकाम 

यूँ ही चलते-चलते  लिखा है दिल ने कुछ तुम्हारे नाम 
उँगली पकड़ो साथ चलो तुम , भूलो न सुबह का पैगाम 
जमीन होती है तो आसमान होता है , खिले होते हैं रँग भी तमाम 

अपनी अँखियों से बाँट रहे हो उजियारा 
खिल उठे हैं फूल ही फूल तमाम 
कुछ यादगार लम्हे , राहत का सामान जुटा लें 


सोमवार, 19 दिसंबर 2016

तुम्हारे जाने के अहसास

चलो तुम्हारे जाने के अहसास को अभी ही जी लेते हैं 
थोड़ा गम पी लेते हैं 
ताकि तुम्हारे जाने के वक़्त आँख में आँसू न हो 

तुम्हारी बाइसिकिल जो तुम घर आ कर चलाया करतीं थीं 
पूछ रही है कि अब आगे इन्तिज़ार कितना लम्बा होगा 
कितनी ही चीजें जो तुम खरीद कर लाईं थीं 
बोलती हुईं सी लगतीं हैं 
कैसे इन्हें अनदेखा करूँ 
मेरी पसन्द को ध्यान में रख कर तुम्हारे लाये हुए फूल,फ्लावर पॉट्स , लैम्प्स 
सब झक्क से रौशन हो उठते हैं 
तुम्हारी चाहत के फूल खिल उठते हैं 

आओ के गले लग जायें 
ये जादू की झप्पी तुम्हें महफूज़ रक्खे उम्र भर 
माँ का आँगन बच्चों की उड़ानों के लिए हमेशा छोटा पड़ जाता है 
जाओ तुम जरा घूम के आओ 
पँख फैलाओ के आसमान तुम्हारे इन्तिज़ार में है 

शुक्रवार, 18 नवंबर 2016

थोड़े चूल्हे जल लेते

इक दिन निजता ले आती है चौराहे पर 
अच्छा होता बाँट जो देता , पैसा जितना ज्यादा था 
चेहरों पर मुस्कान देख कर , पा लेता थोड़ी साँसें 
थोड़े चूल्हे जल लेते , थोड़े अरमाँ पल लेते 

हेरा-फेरी , काला बाजारी , टैक्स की चोरी , कितने दिन !
छुपा न सकेगी लीपा-पोती 
आज बहाने साथ न देंगे , ज़मीर जगा कर देख ले अपना 
कितना पहनेगा , कितना ओढ़ेगा 
सोने का निवाला न निगल पायेगा 

अति कहाँ चुप बैठती है , कुछ न कुछ तो जरूर होना था 
हिला के नींव बीज कोई बोना था 
देश के हित में अलख जगा ले , आहुति दे स्वार्थ की अपने 
अपनी राह में फूल खिला ले